कार्यकर्ता को सतत सीखते रहना चाहिए। इस भ्रम में ना फँस जाए कि वह सब कुछ जानता है। अपनी ज्ञानराशि को सतत बढ़ाते रहना है। ज्ञान अनुभव से आता है। कठिनाई और विपरीत परिस्थितियों में तो ज्ञानवर्द्धक अनुभव स्वतः आते हैं। प्रतिकूलता के अभाव में अनुभव प्राप्त करने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। आज हम में से अधिकतर प्रचुरता की समस्या से पीड़ित हैं। सब कुछ बड़ी सहजता से उपलब्ध हो रहा है। अतः हमें अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रयत्नपूर्वक प्रयोग करने पड़ते हैं। कठिन परिस्थितियों को बनाना पड़ता है, जिससे हमारा ज्ञान व सदाचार दोनों वृद्धिङ्गत होते रहें। जैसे मांसपेशियों के विकास हेतु उन्हें व्यायाम के द्वारा कष्ट देना पड़ता है। उसी प्रकार विपरीत परिस्थितियों में ही चरित्र का विकास होता है।
ज्ञान में जहाँ एक ओर संकल्पनाओं की स्पष्टता होती है, वहीं दूसरी ओर उसे जीवन में उतारने हेतु आवश्यक व्यावहारिक कुशलता का भी समावेश होता है। जैसे निष्ठा और अनुशासन का महत्व प्रतिकूल परिस्थिति में होता है, वैसे ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय, प्रभावी संवाद और चमू निर्माण (Team Building) जैसे व्यावहारिक गुण भी संकट के समय विकसित होते हैं। साथ ही पत्राचार, समाचार और प्रसार सामग्री लेखन, वक्तृता, संगणक प्रयोग (Computer Application), प्रस्तुति सज्जा (Presentation Designing) जैसे वर्तमान समय में अत्यावश्यक कौशल भी चुनौतियों द्वारा सहज सीखे जाते हैं। कार्यकर्ता कार्य की माँग के अनुरूप क्षमता का विकास करने के लिए सदा तत्पर रहता है। ज्ञानार्जन के प्रत्येक अवसर का पूर्ण उपयोग करना जानता है।
आचरण की शुचिता सद्गुणों पर निर्भर करती है। गुणों का भी प्रयत्नपूर्वक विकास करना होता है। शील, विनय, मैत्री, मृदुभाषिता (Soft Spoken), सेवाभाव, सत्कार (Hospitality) आदि गुण कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होते हैं। इनका विकास अनुकरण और अनुसरण से ही होता है। वरिष्ठ अधिकारियों को देखकर उनके जैसा आचरण करने का प्रयास अनुकरण में आता है। भोपाल के एक वृद्ध कार्यकर्ता ओमप्रकाश कुंद्रा जी के साथ संपर्क में जाने पर निकलते समय सोफे अथवा अन्य आसन पर अपने बैठने से बिखरे आवरण, चादर को ठीक करना, सल हटाना, घर की गृहिणी, माता से अनिवार्यतः विदा लेना जैसे सामान्य सदाचार सीखने को मिलते थे। आदर्श चरित्रों के कथाओं में वर्णित व्यवहार को अपने जीवन में उतारना अनुसरण है। हनुमान-विभीषण संवाद से हम शत्रु-मित्र बोध और समुचित संवाद का पाठ पढ़ सकते हैं। हनुमानजी की विनम्रता, वक्तृता और स्वामीनिष्ठा के साथ ही उनकी वीरता, साहस, पराक्रम और चातुर्य भी प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए अनुसरण का विषय है। गुणों का विकास भी कार्यकर्ता के जीवन में महत्व का है।
ज्ञान अर्थात् सिद्धांत स्पष्टता और कौशल की जानकारी तथा सद्गुण आधारित आचरण इन दोनों में ही हमारा आदर्श है – सार्वकालिक सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता हनुमान –
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।
हनुमानजी के लिए सागर की उपमा अत्यन्त समीचीन है। सागर असीम होता है किंतु कभी अपनी सीमा को नहीं लांघता। ग्रहण करने में कोई भी मर्यादा नहीं है किंतु लहरों के प्रवाह का अत्यंत अनुशासित गणित है। हनुमान जी की पूंछ के समान ही उनकी क्षमता वृद्धि की कोई सीमा नहीं है। किंतु उसके प्रयोग में रामकार्य अर्थात् धर्म मार्ग की मर्यादा है। सामर्थ्य जब अनुशासित होता है तभी धर्म के काम आता है। जब ज्ञान व गुणों के सागर बनने का सतत प्रयत्न करते रहेंगे तब हम अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ हो ही जाएंगे। हनुमान जी कपि हैं तो कपीश हैं – कपियों में सर्वोत्तम। ज्ञान और गुण से कार्यकर्ता में सहज अहंकार रहित श्रेष्ठता और नेतृत्व का विकास होता है।
इस विकास का दूसरा परिणाम यह होगा कि कार्यकर्ता का आचरण सदैव आलोकित करने वाला होगा। तीनों लोकों को उजागर, प्रकाशमान कर देगा। अर्थात् हमारा बीत चुका व्यवहार (भू), जिसे हम सिंहावलोकन से जानते हैं, वह भी उज्ज्वल होगा; हमारा आगामी नियोजन (भुवः) भी सुस्पष्ट व मार्गदर्शक होगा; साथ ही कार्य के सम्बन्ध में हमारा दूरगामी लक्ष्य व उस स्वप्न को साकार करने की कार्य योजना (स्वः) भी सदैव हमारे सम्मुख प्रकाशित होगी। अर्थात्, तीनों लोक आलोकित होंगे और ऐसे आलोक से ही नित्य लोक-कल्याण सम्भव है। यह आलोक प्रचार और प्रदर्शन की चमक ना होकर, कार्यकर्ता के अनुभूत ज्ञान और सहज आचरित गुणों के प्रकाश का प्राकृतिक आलोक होगा। व्यक्ति निर्माण का यह गौरव ही राष्ट्र निर्माण की नींव बनेगा। ज्ञान-गुण से ही होते हैं तीनों लोक उजागर।
-डॉ अमित कांसल