अक्सर समाज में नशे को एक व्यक्तिगत बुराई या चरित्र की कमी के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकट है। आज आवश्यकता दंड की नहीं, अपितु सही दिशा, निरंतर संवाद और दृढ़ संकल्प की है।
पुनर्प्राप्ति (Recovery) का मार्ग ‘आत्ममंथन’ से शुरू होता है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को और अपने भारत राष्ट्र को साक्षी मानकर यह संकल्प लेता है कि वह इस अंधकार से बाहर निकलेगा, तभी बदलाव की नींव पड़ती है। इसमें ‘परामर्श’ (Counseling) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के साथ किया गया संवाद व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त बनाता है।
याद रखें, नशा नहीं, हमें जीवन चाहिए। यदि हम अपनों को सही समय पर दिशा और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करें, तो हर व्यक्ति फिर से समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बन सकता है। आइए, इस संघर्ष में एक-दूसरे का संबल बनें।
— Dr. Amit Kansal, Nasha Mukti Chetna Sangh